यों ही राहों में मिल जाते कुछ जाने-अनजाने लोग;
अक्सर याद दिला देते हैं कुछ भीगे अफ़साने लोग।
पल भर में अपना सा लगने लगता कोई शख्स कभी,
जिनको हरदम अपना माना वो निकले बेगाने लोग।
अच्छों को भी बुरा बताना कुछ लोगों की फितरत है;
मगर न हमने सुनी किसीकी आए जब बहकाने लोग।
अपना बन कर गले लगाते, दिल दीवाना कर देते;
लेकिन हौले-हौले लगते अपना रंग दिखाने लोग।
काजल भरी कोठरी से वे ले आए हीरे-मोती;
हमने क्यों उस ओर न देखा, गलती लगे बताने लोग।
जाती थीं जो दरबारों तक उन सड़कों पर नहीं मुड़े;
' उम्र गँवा दी कुछ तो सीखो', लगे हमें समझाने लोग।
रहे पीटते लीक पुरानी नया न कुछ कर पाए जो;
देख कामयाबी औरों की लगते बस बिसराने लोग।
दरवाजे पर दस्तक देते अपने मतलब की खातिर;
मगर न मुड़ कर आते फिर जो होते बहुत सयाने लोग।
नए वक्त में नई अदा से मिलते हर दिन शख्स नए;
पर जब भी हम हुए अकेले आए याद पुराने लोग।
-हेमन्त 'स्नेही'
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कविता के अनुर्वर प्रदेश की ज़रख़ेज़ ज़मीन
5 years ago