प्रेम-अनुबंध कहाँ पाओगे;
भाव-मकरंद कहाँ पाओगे,
धन से सुख तो खरीद लोगे पर,
मन का आनन्द कहाँ पाओगे।
भाव का मेह कहाँ पाओगे;
प्यार का गेह कहाँ पाओगे;
दोस्त चाहे तुम्हें मिलें लाखों,
किन्तु यह स्नेह कहाँ पाओगे।
प्रेम प्रासाद क्यों ढहा होता;
आँख से नीर क्यों बहा होता;
आप पर क्या न वार देते हम,
आपने बस कभी कहा होता।
एक दीपक जलाए ही रखते;
बात मन की छुपाए ही रखते;
था हमें भ्रम कि आप अपने हैं,
आप यह भ्रम बनाए ही रखते।
-हेमन्त 'स्नेही'
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कविता के अनुर्वर प्रदेश की ज़रख़ेज़ ज़मीन
5 years ago