Saturday, October 3, 2009

एक ग़ज़ल की कहानी

अपनी एक ग़ज़ल आए याद पुराने लोग के उद्भव और फ़िर उसकी परिणति की कहानी से आपको अवगत कराना चाहता हूँ। दरअसल , मैंने कुछ दिन पूर्व (गत १३ सितम्बर को) डरता हूँ 'अक्लमंदों' से शीर्षक के अन्तर्गत चार रुबाइयाँ पोस्ट की थीं। इन रुबाइयों पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज़ करते हुए प्रिय मित्र अनुराग अन्वेषी ने एक ग़ज़ल के कुछ शे'र उद्धृत किए थे। इस ग़ज़ल के रचयिता का नाम न तो अनुराग को मालूम है, न ही प्रयास के बावजूद मैं खोज सका। शे'र थे---
अपनी डफली, अपना सरगम, अपने में दीवाने लोग,
रिश्तों के टूटे दर्पण में सब के सब बेगाने लोग।
कांटों का मौसम तो हमने तन्हा-तन्हा पार किया,
फूलों के मौसम में आए हमको गले लगाने लोग।...
ये शे'र मुझे बहुत ही अच्छे लगे, विशेष रूप से इनका काफिया और रदीफ़। विषय और भाव तो मोहक थे ही। परिणाम यह हुआ की मैं इसी बहर पर और कुछ ऐसे ही काफिये और रदीफ़ को लेकर एक ग़ज़ल लिखने का मोह संवरण नहीं कर सका। और इस तरह उद्भव हुआ ग़ज़ल आए याद पुराने लोग का, जिसे मैंने गत १७ सितम्बर को इसी ब्लॉग पर पोस्ट किया था। ग़ज़ल थी ---

यों ही राहों में मिल जाते कुछ जाने-अनजाने लोग;
अक्सर याद दिला देते हैं कुछ भीगे अफ़साने लोग।

बरसों जिनको अपना समझो वही निकलते गैर कभी;
पल भर में अपने हो जाते लेकिन कुछ बेगाने लोग।

अच्छों को भी बुरा बताना कुछ लोगों की फितरत है;
मगर न हमने सुनी किसी की आए जब बहकाने लोग।

अपना बन कर गले लगाते, दिल दीवाना कर देते;
लेकिन हौले-हौले लगते अपना रंग दिखाने लोग।

काजल भरी कोठरी से वे ले आए हीरे-मोती;
हमने क्यों उस ओर न देखा, गलती लगे बताने लोग।

जाती थीं जो दरबारों तक उन सड़कों पर नहीं मुड़े;
'उम्र गँवा दी कुछ तो सीखो', लगे हमें समझाने लोग।

रहे पीटते लीक पुरानी नया न कुछ कर पाए जो;
देख कामयाबी औरों की लगते बस बिसराने लोग।

दरवाजे पर दस्तक देते अपने मतलब की खातिर;
मगर न मुड़ कर आते फिर जो होते बहुत सयाने लोग।

नए वक्त में नई अदा से मिलते हर दिन शख्स नए;
पर जब भी हम हुए अकेले आए याद पुराने लोग।

लेकिन कहानी अभी समाप्त नहीं हुई। इस ग़ज़ल को पढ़ कर एक हास्य कवि हँसोड़ हँसीलाबादी ने एक पैरोडी लिख डाली और मुझे इस टिप्पणी के साथ भेजी कि ' हर अच्छी ग़ज़ल का सत्यानाश करना मैं अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता हूँ, लिहाज़ा आपकी ग़ज़ल भी इस सदगति से बच नहीं सकती।' बहरहाल हँसोड़ हँसीलाबादी जी की पैरोडी ज्यों की त्यों ससम्मान यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ---

कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं उल्लू हमें बनाने लोग,
सुनते नहीं किसीकी आते ही सर लगते खाने लोग।

लम्बी-लम्बी हाँका करते जैसे हों ये अरबपती,
कहो पान को तो झट लगते खाली जेब दिखाने लोग।

सुबह-सुबह जो शकल देख लो दिन भर चाय नहीं मिलती,
अब चाहे कमबख्त कहो या कहो उन्हें मरजाने लोग।

डंडा दिखा-दिखा कर मुझको रहे डराते सारी उम्र,
मैंने जब बन्दूक दिखा दी तुरत लगे मिमयाने लोग।

देख थोबड़ा मेरा फ़ौरन नज़र बचा कर चल देते,
साली हो गर साथ लिपट कर लगते गले लगाने लोग।

अगर मंच से महिला कोई पढ़े ग़ज़ल तो क्या कहने,
मेरे माइक पर आते ही लगते हैं हुटियाने लोग।

हाड़तोड़ जो मेहनत करते पाते नहीं चबेना भी,
हाथ हिलाते नहीं कभी पर खाते खूब मखाने लोग।

परेशान है सी बी आई , रँगे हाथ पकड़े कैसे,
रिश्वत लेने लगे पहन कर हाथों में दस्ताने लोग।

मेरी ग़ज़ल को इस सदगति तक पहुँचाने के लिए हँसोड़ जी का आभार व्यक्त करना अपना कर्तव्य समझता हूँ। हास्य कवि कभी-कभी हलके-फुल्के ढंग से भी कितनी बड़ी बातें कह देते हैं, यह ग़ज़ल उसका उदाहरण है। खास तौर पर यह शे'र ---

हाड़तोड़ जो मेहनत करते , पाते नहीं चबेना भी ;
हाथ हिलाते नहीं कभी पर खाते खूब मखाने लोग।


-हेमन्त 'स्नेही'

2 comments:

अमिताभ मीत said...

बहुत खूब. ग़ज़ल भी और पैरोडी भी.

poonam said...

very nice sir, ek saath do andaaz me lajwaab sandesh....
thanks.