Thursday, September 17, 2009

आए याद पुराने लोग (ग़ज़ल)

यों ही राहों में मिल जाते कुछ जाने-अनजाने लोग;
अक्सर याद दिला देते हैं कुछ भीगे अफ़साने लोग।

पल भर में अपना सा लगने लगता कोई शख्स कभी,
जिनको हरदम अपना माना वो निकले बेगाने लोग


अच्छों को भी बुरा बताना कुछ लोगों की फितरत है;
मगर न हमने सुनी किसीकी आए जब बहकाने लोग।

अपना बन कर गले लगाते, दिल दीवाना कर देते;
लेकिन हौले-हौले लगते अपना रंग दिखाने लोग।

काजल भरी कोठरी से वे ले आए हीरे-मोती;
हमने क्यों उस ओर न देखा, गलती लगे बताने लोग।


जाती थीं जो दरबारों तक उन सड़कों पर नहीं मुड़े;
' उम्र गँवा दी कुछ तो सीखो', लगे हमें समझाने लोग।

रहे पीटते लीक पुरानी नया न कुछ कर पाए जो;
देख कामयाबी औरों की लगते बस बिसराने लोग।

दरवाजे पर दस्तक देते अपने मतलब की खातिर;
मगर न मुड़ कर आते फिर जो होते बहुत सयाने लोग।

नए वक्त में नई अदा से मिलते हर दिन शख्स नए;
पर जब भी हम हुए अकेले आए याद पुराने लोग।


-हेमन्त 'स्नेही'
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Sunday, September 13, 2009

डरता हूँ 'अक्लमंदों' से (रुबाइयाँ)

काश , ऐसा न कुछ करे कोई,
रात भर सिसकियाँ भरे कोई,
बेवफाई न इस कदर कीजे,
प्यार के नाम से डरे कोई।

लोग कितने अजीब होते हैं,
गर्ज़ हो तो करीब होते हैं,
फेर लेते नज़र खुदा बन कर,
क्योंकि दिल के ग़रीब होते हैं।

खौफ़ कैसा खुदा के बन्दों से,
खंजरों से लगे न फन्दों से,
कातिलों से नहीं मुझे दहशत,
सिर्फ़ डरता हूँ 'अक्लमंदों' से।

हो गए क्यों निसार हम ज़्यादा,
पालते ही रहे भरम ज़्यादा,
दुश्मनों से नहीं गिला कोई,
दोस्तों ने किए सितम ज़्यादा।

-हेमन्त 'स्नेही'

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Thursday, August 20, 2009

कद्र कीजिए नातों की ( ग़ज़ल )

कद्र कीजिए नातों की,
दिल से दिल की बातों की।

अक्सर बहुत रुलाती हैं,
यादें कुछ आघातों की।

सूरज वो जो धो डाले,
सारी स्याही रातों की।

क्या-क्या रंग दिखाती हैं,
चन्द लकीरें हाथों की।

देखे ऐसे लोग बहुत,
खाते जो बस बातों की।


पढ़ो इबारत फुरसत में,
अपने दिल के खातों की।


किस्मत याद दिला देती,
सब को ही औकातों की।

खाली हाथ, मगर दिल में,
दौलत हो जज़्बातों की।


-हेमन्त 'स्नेही'
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Friday, May 29, 2009

प्यार है अनमोल (चार मुक्तक)

प्यार हर सम्बन्ध का आधार है;
प्यार से मन को मिला विस्तार है;
ज़िन्दगी निःसार है बिन प्यार के,
प्यार जीवन का सहज सिंगार है।
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प्रेम-पथ की यात्रा अविराम है;
सार्थक लेकिन सदा निष्काम है;
प्यार का अभिप्राय चंचलता नहीं,
प्यार अविचल साधना का नाम है।
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प्यार है अनमोल धन स्वीकार कर;
मत कभी इस सत्य से इनकार कर;
क्या पता भगवान कब किसको मिले,
बस अभी इंसान से तू प्यार कर।
***
प्यार अपने ही हृदय का ज्ञान है;
प्यार जीवन का अटल विज्ञान है;
प्यार को पूजा समझना चाहिए,
प्यार प्रभु का श्रेष्ठतम वरदान है।
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-हेमन्त 'स्नेही'

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Saturday, February 14, 2009

ज़िन्दगी यों गुज़रनी चाहिए

ज़िन्दगी यों गुज़रनी चाहिए.
आदमीयत निखरनी चाहिए.

जो परेशां करे किसी को भी,
बात ऐसी न करनी चाहिए.

लोग हमको न बेवफा कह दें ,
सोच कर रूह डरनी चाहिए।

दर्द दिल में रहें दफ़न कितने,
मुस्कराहट बिखरनी चाहिए.

काश, कुछ काम वो करें जिससे,
कोई किस्मत संवरनी चाहिए.

ठेस गर आपको लगे कोई,
आँख मेरी भी भरनी चाहिए.

हो न जज़्बा अगर निभाने का,
दोस्ती ही न करनी चाहिए।

-हेमन्त 'स्नेही'
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Sunday, February 8, 2009

कुछ पंक्तियाँ, नभाटा के सहयोगियों के नाम...

सुबह गुज़रती और शाम कट जाती है,
मगर हमेशा याद आपकी आती है।

अख़बारों के साथ सुबह दस्तक कोई,
हर दिन मेरा दरवाज़ा खटकाती है।

ख़बरों के ही बीच झरोखे से अक्सर,
कोई शक्ल उभर कर कुछ मुस्काती है।

किसी पृष्ठ पर कहीं चुटीली सी फब्ती,
किसी कलम की कारीगरी दिखाती है।

हर दिन कुछ पन्ने मोहक बन जाते हैं,
मित्रों की प्रतिभा जब रंग जमाती है।

जिनको अक्सर याद किया करते हैं हम,
क्या उनको भी याद हमारी आती है !

-हेमन्त 'स्नेही'
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Wednesday, December 31, 2008

वर्ष, महीने और दिन

वर्ष, महीने और दिन,
सदियाँ और पल-छिन,
आते हैं और जाते हैं,
बहुत कुछ हम पाते हैं,

लेकिन, सब कुछ है बेकार,
न मिले यदि अपनों का प्यार।
सह सकते हैं हम हर अभाव,
बस, न मिले किसी सम्बन्ध के टूटने का घाव।

-हेमन्त 'स्नेही'
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Monday, October 20, 2008

मम्मी, चलो चाँद पर जाएँ (बालगीत)


मम्मी, चलो चाँद पर जाएँ।
बढ़िया सी पिकनिक कर आएँ।

बात चाँद की बड़ी निराली,
लगता है अमृत की प्याली,
आसमान में घूमे जैसे
तारों की बगिया का माली।
मगर न आता पास हमारे
चाहे जितना इसे बुलाएं।
मम्मी, चलो चाँद पर जाएँ।

चमके तो धरती उजियाली,
छिप जाए तो रातें काली,
कभी लगे चाँदी का हँसिया
कभी लगे सोने की थाली।
लेकिन सचमुच में कैसा है
देखें, फिर सबको बतलाएं।
मम्मी, चलो चाँद पर जाएँ।


अब तक बातें सुनीं पुरानी,
अजब-गज़ब सी कई कहानी,
चला रही है चरखा कब से
बैठ चाँद पर बुढ़िया नानी।
राज़ खुले चन्दा मामा के
निकलीं सारी गप्प कथाएँ।
मम्मी, चलो चाँद पर जाएँ।

कहते बड़े-बड़े विज्ञानी,
ये सारी बातें बेमानी,
है चन्दा भी पृथ्वी जैसा
मिल जाए बस थोड़ा पानी।
धरती पर है भीड़ बहुत अब
चलो, चाँद पर नगर बसाएँ।
मम्मी, चलो चाँद पर जाएँ।
बढ़िया सी पिकनिक कर आएँ।
~
 
-हेमन्त 'स्नेही'
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Thursday, October 2, 2008

राजघाट


राष्ट्रपिता का जन्मदिवस जग मना रहा था सारा,
रुकी न दिन भर राजघाट पर उमड़ रही जनधारा ।
श्रद्धा से सब शान्तिदूत को सुमन चढ़ाते जाते,
चरखा-यज्ञ किया भक्तों ने रामनाम धुन गाते ।
गाँधी की जयकारों के स्वर दिशा-दिशा में गूंजे,
अधरों पर संकल्प आज थे आसमान से ऊंचे ।
भारत के कर्णधारों ने उत्सव बहुत मनाये,
सांझ हुई तो महातीर्थ पर अनगिन दीप जलाये ।
चाँद-सितारों से मंडित हो चादर गगन तनी थी,
दीपावलियों से सज्जित हो दिल्ली दुल्हन बनी थी ।
मगर रात को राजनगर का कोलाहल जब सोया,
जाने किस अंतर्पीड़ा से राजघाट तब रोया ।

मन में उठा प्रश्न जाने यह किसका करुण रुदन है,
भटक रहा क्यों बियाबान में किसका कोमल मन है,
शायद किसी ह्रदय की कोई दुनिया लूट गया है,
किसी नयन का कोई सुंदर सपना टूट गया है ,
क्यों उदास लगती है जाने धारा यह चाँदी की,
फूलों से दब कर है व्याकुल क्यों समाधि गाँधी की,
किसका मन इस पुण्य तीर्थ पर धीर नहीं धरता है,
गाँधी का आशीष कौनसी पीर नहीं हरता है,
कौन रात की स्याही आंसू के जल से धोता है,
जाने किस अंतर्पीड़ा से राजघाट रोता है ।


प्रश्न न अधरों तक आया था सुना आर्द्र स्वर कोई,
पहले से ही दुखी आत्मा और फूट कर रोई---
है कोई संतान आज जो मेरा दुःख पहचाने,
मेरे पुत्र आज मेरी ही पीड़ा से अनजाने !
सोचें तो, क्या हिंसा से मैं कभी हार सकता था,
गोली से क्या कभी गोडसे मुझे मार सकता था !
जीवन के अन्तिम क्षण तक भी आँख न मेरी रोई,
सीने पर गोली खा कर भी नहीं आत्मा सोई,
शायद सबको मैं चिरनिद्रा में सोया लगता हूँ,
मगर देश की दशा देख मैं रातों को जगता हूँ ।
जो जनसेवक बन ऊंचे प्रासादों में रहते हैं,
सदा स्वयं को सर्वसिद्ध गांधीवादी कहते हैं,
मेरी मूरत के आगे जो दीपक बाल रहे हैं,
मेरी पलकों पर फूलों के परदे डाल रहे हैं,
प्रतिदिन उनके ही हाथों से मेरा वध होता है,
यही देख कर रोज़ रात को राजघाट रोता है ।

यह कैसा जनतंत्र देश में कैसी यह आज़ादी,
दल के बल पर शासन करते हैं कुछ अवसरवादी,
हुई न पूरी कोई अब तक जनता की अभिलाषा,
शासन पर शासन करती है अभी विदेशी भाषा,
सिक्कों में साहित्यकार की कलम आज बिकती है,
व्यक्ति वन्दना लक्ष्य मान कर शब्द मात्र लिखती है,
लगता है उपवन को जैसे माली लूट गया है,
मेरा रामराज्य का सुन्दर सपना टूट गया है,
सोच रहा आजाद देश को कितना कुछ खोना था,
मेरे सपनों का भारत क्या ऐसा ही होना था !
किसने स्वर्णिम पृष्ठों पर यह श्याम रंग पोता है !
यही देख कर रोज़ रात को राजघाट रोता है ।
~
-हेमन्त 'स्नेही'
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Monday, September 29, 2008

एक अमूल्य उपहार


सुबह-सुबह उठा ही था। आदत के मुताबिक ड्राइंग रूम में आकर बैठा और अखबार उठा कर देखने लगा। तभी दोनों पुत्र और पुत्र वधुएं आए और जन्मदिन की बधाई देने लगे। साथ में दोनों पौत्र और पौत्री भी थे। चूँकि औपचारिक तौर पर अपना जन्मदिन कभी मनाया नहीं, इसलिए जन्मतिथि पर ज्यादा ध्यान भी नहीं रहता। बहरहाल, बच्चों की बधाइयाँ पाकर एक सुखद अनुभूति कहीं गहरे उतर गई। लेकिन अभी कुछ और बाकी था।

पुत्रवधू प्रिया के हाथ में एक गिफ्ट पैक था। उसने पैक को खोला और फ्रेम में जड़ी एक तस्वीर मेरे हाथ में थमा दी। तस्वीर देख कर कुछ क्षण के लिए तो मैं ठगा सा रह गया। मेरे कॉलिज जीवन का एक फोटोग्राफ था, जिसे मुंबई स्थित एक नामी स्टुडियो से बड़े आकर में बनवाया गया था। इन्द्रधनुषी रंगों के जमाने में ब्लैक एंड वाइट चित्र देखकर कुछ ऐसा ही एहसास हो रहा था, जैसे कीमती कप की जगह मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पीने पर एक सोंधी सी सुगंध मन को ही नहीं आत्मा तक को तृप्त कर देती है।


चित्र एक कवि-सम्मेलन का था, जिसमें मैं अपने गृहनगर मेरठ के मंच पर खड़ा कविता पाठ कर रहा हूँ। अपना लगभग 35 वर्ष पुराना चित्र एक भव्य रूप में देख कर मैं बहुत देर तक रोमांचित रहा। अपने स्वभाव के अनुसार बच्चों को उनके मस्तक चूम कर आशीर्वाद तो दिया ही, साथ ही सोचने लगा कि इस आयु में मुझे इतना अमूल्य उपहार देने के लिए बच्चों ने कितना दिमाग लड़ाया होगा। प्रभु से प्रार्थना है कि वह उनकी वे सभी आकांक्षाएं पूरी करे, जिन्हें मैं पूरी नहीं कर सका।

Saturday, September 20, 2008

हर तरफ़ लगता चमन जलता हुआ (ग़ज़ल)

हर तरफ़ लगता चमन जलता हुआ,
आदमी को आदमी छलता हुआ।

हो गया हर लक्ष्य बौना इस तरह,
बर्फ जैसे धूप में गलता हुआ।

हो न पाया जो कभी साकार वो,
ख्वाब आंखों में रहा पलता हुआ।

घोषणाओं पर अमल होता नहीं,
देखिए हर फ़ैसला टलता हुआ।

जो गया दरबार खाली हाथ ले,
लौट आया हाथ वो मलता हुआ।

जड़ नहीं जिसकी ज़मीं में देखिए,
खूब उसको फूलता-फलता हुआ।

नीति का आदर्श कुछ ऐसा लगे,
सूर्य जैसे शाम का ढलता हुआ।

था कहाँ जाना मुझे ना पूछिए,
आ गया जाने कहाँ चलता हुआ।