Friday, September 12, 2008

उमर खैयाम की रुबाइयां

ईरान का दार्शनिक कवि उमर खैयाम दुनिया भर को आकर्षित करता रहा है. हिंदी में खैयाम की रुबाइयों के अधिसंख्य रूपान्तर मूल कृति (फारसी) से न होकर एडवर्ड फिट्ज़जेराल्ड कृत अंग्रेजी अनुवाद से हुए हैं. यह जानते हुए भी कि मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पन्त और डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन जैसे स्वनामधन्य कवि खैयाम कि मादक मदिरा अपनी-अपनी सुंदर सुराही में ढाल कर पेश कर चुके हैं, मैं यह प्रयास करने का लोभ संवरण नहीं कर सका।
आमतौर पर खैयाम को 'खाओ, पियो और मौज करो ' के जीवन-दर्शन का प्रणेता समझा जाता है, लेकिन संसार की नश्वरता से जीवन के प्रति उत्पन्न विरक्ति का भाव भी खैयाम की कई रुबाइयों में पूरी प्रखरता के साथ प्रस्फुटित हुआ है. अनुदित कुल 75 रुबाइयों में से कुछ चुनी हुई रुबाइयाँ यहाँ प्रस्तुत हैं. काव्य रसिकों की सुविधा के लिए यहाँ अपने हिन्दी अनुवाद से पहले फिट्ज़जेलाल्ड कृत अंग्रेजी अनुवाद भी दे रहा हूँ.


A Book of Verses underneath the Bough,
A Jug of Wine, a Loaf of Bread—and Thou
Beside me singing in the Wilderness—
Oh, Wilderness were Paradise enow!


हरे - भरे वृक्षों के नीचे दो टुकड़े रोटी के साथ,
मिला एक मदिरा का सागर, कविता पुस्तक मेरे हाथ.
निकट बैठ तुम गीत सुनातीं छेड़े मन वीणा के तार,
यों समझो इस वीराने में मुझको मिला स्वर्ग का द्वार.

***


"How sweet is mortal Sovranty!"--think some
Others--"How blest the Paradise to come
Ah, take the Cash in hand and waive the Rest;
Oh, the brave Music of a distant Drum!


कुछ के मुख से बरबस निकला कितना सुन्दर है भूलोक,
कहा किसी ने स्वर्गलोक के होते हैं मनमोहन भोग.
मिले आज जो उसको भोगें कल के सपने ठगते हैं,
अरे अबोधो, सदा दूर के ढोल सुहाने लगते हैं।

***

Ah! my Beloved, fill the Cup that clears
To-day of past Regrets and future Fears
To-morrow?--Why, To-morrow I may be
Myself with Yesterday's Sev'n Thousand Years.

प्राणप्रिये, ढालो मदिरा जो कर दे मेरे सब दुःख दूर,
बीते पर क्यों खेद करुँ मैं, क्यों समझूं कल होगा क्रूर.
कल किसने देखा है जग में मत गाना प्रिय कल के गीत,
आज पिला दो हो सकता है कल तक जीवन जाए बीत।

***

Ah, make the most of what we yet may spend,
Before we too into the Dust descend;
Dust into Dust, and under Dust to lie,

Sans Wine,sans Song, sans Singer, and-sans End!

अभी समय कुछ शेष बचा है अभी अन्त में है कुछ देर,
क्यों न जी भर जश्न मनाएं जब तक बनें राख के ढेर.
जहाँ मिलेगी राख खाक में वहीँ ख़त्म होगा यह खेल,
सुर, संगीत, सुरा से मधुरे, कभी नहीं फिर होगा मेल।

***
Into this Universe, and Why not knowing

Nor Whence, like Water willy-nilly flowing;

And out of it, as Wind along the Waste,

I know not Whither, willy-nilly blowing।

कौन कहाँ से आया क्यों मैं, जाने क्यों दुःख सहता हूँ,
क्या है मेरा लक्ष्य न जानूं, अविरल जल सा बहता हूँ.
जाना मुझे शीघ्र ऐसे ही जैसे मरुथल से तूफ़ान,
क्या मालूम कहाँ जाना है, अपनी मंजिल से अनजान।

***

'This all a Chequer-board of Nights and Days
Where Destiny with Men for Pieces plays:
Hither and thither moves, and mates, and slays,

And one by one back in the Closet lays।


यह संसार खेल शतरंजी कोष्ठ बने जिसके दिन-रात,
मानव रुपी मोहरों पर नित नियति दिखाती अपने हाथ.
इधर-उधर कर कभी हराती, कभी जिताती वह सानन्द,
कभी उठा डाला थैली में होता जहाँ खेल का अन्त।

***

The Ball no Question makes of Ayes and Noes,
But Right or Left as strikes the Player goes;
And He that toss'd Thee down into the Field,

He knows about it all--HE knows--HE knows!


गेंद भला कब किससे करती हाँ-ना वाले प्रश्न कभी,
जिधर खिलाड़ी ठुकरा देता मुड़ जाती उस ओर तभी.
चतुर खिलाड़ी फेंका जिसने तुझे लुढ़कने को भू पर,
उसे ज्ञान तेरे कर्मों का बैठा देख रहा ऊपर।

***

The Moving Finger writes; and, having writ,
Moves on: nor all your Piety nor wit,

Shall lure it back to cancel half a Line,

Nor all your Tears wash out a Word of it।

भाग्य-विधाता की उंगली बिन रुके एक पल लिखती लेख,
भक्ति-ज्ञान विद्या के बल पर नहीं कभी मिटती लघु रेख।
चाहे आंसू लाख बहा तू, चाहे आह भरे प्रति पल,
एक शब्द भी धो नहीं पायेगा तेरे नैनों का जल।

***

Alas, that Spring should vanish with the Rose!

That Youth's sweet-scented Manuscript should close!

The Nightingale that in the Branches sang, Ah,

whence, and whither flown again, who knows।

वासंती ऋतु के जाते ही मुरझा जाते सभी गुलाब,
हो जाती तत्काल बंद फिर नव यौवन की खुली किताब।
कल तक जो बुलबुल शाखों पर गाती गीत मचाती धूम,
जाने कौन, कहाँ से आई, किधर उड़ी किसको मालूम.

12 comments:

Udan Tashtari said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.

शोभा said...

बहुत अच्छा लिखा है। स्वागत है आपका।

कविता वाचक्नवी said...

नए चिट्ठे का स्वागत है. निरंतरता बनाए रखें.खूब लिखें,अच्छा लिखें.

राजेंद्र माहेश्वरी said...

आज पिला दो हो सकता है कल तक जीवन जाए बीत।

आज, दो कल के बराबर है।

सराहनीय प्रयास.....

Amit K. Sagar said...

बहुत ही उम्दा. सराहनीय काम. शुभकामनाएं. धन्यवाद.
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ई-गुरु राजीव said...

अरे भाई हेमंत जी, आप ने अपनी यह बात शेयर कर के हम सभी का ज्ञान बढाया है, ईरान और भारत का संस्कृत यानी वैदिक काल से ही गहरा रिश्ता रहा है. और उमर खय्याम की रुबाइयां तो विश्व-प्रसिद्द हैं.
लिखते रहिये. आप भी अपनी नेट सक्रियता बनाए रहें.

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर। नियमितता बनाये रखें।

शहरोज़ said...

श्रेष्ठ कार्य किये हैं.
आप ने ब्लॉग ke maarfat जो बीडा उठाया है,निश्चित ही सराहनीय है.
कभी समय मिले तो हमारे भी दिन-रात आकर देख लें:

http://shahroz-ka-rachna-sansaar.blogspot.com/
http://hamzabaan.blogspot.com/
http://saajha-sarokaar.blogspot.com/

राजेश अग्रवाल said...

स्नेही जी आपने सचमुच हिन्दी के पाठकों के लिये बहुत बड़ा काम किया है. उमर खैय्याम की रूबाईयों का हिन्दी रूपान्तरण करने में आपका परिश्रम झलकता है. अपने इस हुनर को निरन्तर फलने-फूलने दें. मेरी हार्दिक शुभकामनाएं..
www.sarokaar.blogspot.com

प्रदीप मानोरिया said...

ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है बधाई कृपया मेरे ब्लॉग पर पधारें

irdgird said...

बेहतर प्रस्‍तुति। बधाई।

सजीव सारथी said...

नए चिट्टे की बहुत बहुत बधाई, निरंतर सक्रिय लेखन से हिन्दी ब्लॉग्गिंग को समृद्ध करते रहें.

आपका मित्र
सजीव सारथी
आवाज़