Monday, September 29, 2008

एक अमूल्य उपहार


सुबह-सुबह उठा ही था। आदत के मुताबिक ड्राइंग रूम में आकर बैठा और अखबार उठा कर देखने लगा। तभी दोनों पुत्र और पुत्र वधुएं आए और जन्मदिन की बधाई देने लगे। साथ में दोनों पौत्र और पौत्री भी थे। चूँकि औपचारिक तौर पर अपना जन्मदिन कभी मनाया नहीं, इसलिए जन्मतिथि पर ज्यादा ध्यान भी नहीं रहता। बहरहाल, बच्चों की बधाइयाँ पाकर एक सुखद अनुभूति कहीं गहरे उतर गई। लेकिन अभी कुछ और बाकी था।

पुत्रवधू प्रिया के हाथ में एक गिफ्ट पैक था। उसने पैक को खोला और फ्रेम में जड़ी एक तस्वीर मेरे हाथ में थमा दी। तस्वीर देख कर कुछ क्षण के लिए तो मैं ठगा सा रह गया। मेरे कॉलिज जीवन का एक फोटोग्राफ था, जिसे मुंबई स्थित एक नामी स्टुडियो से बड़े आकर में बनवाया गया था। इन्द्रधनुषी रंगों के जमाने में ब्लैक एंड वाइट चित्र देखकर कुछ ऐसा ही एहसास हो रहा था, जैसे कीमती कप की जगह मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पीने पर एक सोंधी सी सुगंध मन को ही नहीं आत्मा तक को तृप्त कर देती है।


चित्र एक कवि-सम्मेलन का था, जिसमें मैं अपने गृहनगर मेरठ के मंच पर खड़ा कविता पाठ कर रहा हूँ। अपना लगभग 35 वर्ष पुराना चित्र एक भव्य रूप में देख कर मैं बहुत देर तक रोमांचित रहा। अपने स्वभाव के अनुसार बच्चों को उनके मस्तक चूम कर आशीर्वाद तो दिया ही, साथ ही सोचने लगा कि इस आयु में मुझे इतना अमूल्य उपहार देने के लिए बच्चों ने कितना दिमाग लड़ाया होगा। प्रभु से प्रार्थना है कि वह उनकी वे सभी आकांक्षाएं पूरी करे, जिन्हें मैं पूरी नहीं कर सका।

3 comments:

उन्मुक्त said...

जन्मदिन मुबारक - वास्तव में अनमोल तोहफा

singh said...

Really... very-very thoughful gift from them. you must have lived a whole life in those moments of togetherness.
Manjula

Neetu Singh said...

Really sir,its unforgattable gift.Happy belated birthday sir