Sunday, October 20, 2013

लालू जी को जेल

राज कहो क़ानून का या किस्मत का खेल,
चारा खाने के लिए लालू जी को जेल।

चारा-चारा कर रहे घर-बाहर सब लोग,
लालू बे-चारा हुए सब करनी का भोग।
...
कहती होंगी राबड़ी 'लालू तुम बेजोड़,
चारा ही खाते रहे घर में रबड़ी छोड़'।

'देख रहे क़ानून के कितने लम्बे हाथ,
क्यों बे-चारा हो गए चारा खा कर नाथ।'

Friday, June 21, 2013

प्रकृति से खेलना भारी पड़ा देखो

हुआ है हादसा कितना बड़ा देखो
प्रकृति से खेलना भारी पड़ा देखो


किले जैसे मकाँ कुछ इस तरह बिखरे
कि जैसे फूटता कच्चा घड़ा देखो

 
न जाने काल-कलवित हो गये कितने
बढ़ेगा कब तलक ये आँकड़ा  देखो
  
 
बहुत पर्यावरण से छेड़खानी क़ी 
नियति ने क्या तमाचा है जड़ा देखो
 

किसी की देह चिथड़ों में मिली लिपटी 
किसी के हाथ सोने का कड़ा देखो 


पहाड़ों को बहुत ज़ख़्मी किया हमने 
हमारी आँख में काँटा गड़ा देखो 


-हेमन्त 'स्नेही'

Tuesday, June 11, 2013

दिखता नहीं विकल्प

सभी दलों का देखिए हाल हुआ बेहाल,
कहीं लूट की छूट तो मचता कहीं बवाल।

तंत्र बदलने के लिए ले तो लें संकल्प,
पर बदकिस्मत देश को दिखता नहीं विकल्प।

आदर्शों-सिद्धांतों की करते जो बात,
व्यक्ति-वन्दना में जुटे जोड़े दोनों हाथ।

युवा फ़ौज आगे बढ़े इसमें सब की शान,
मगर बुज़ुर्गों को सदा मिले मान-सम्मान।

तूफानों के बीच हो कैसे बेड़ा पार,
अगर बोझ लगने लगे नौका का ही भार।

-हेमन्त 'स्नेही'

Thursday, January 3, 2013

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन

भीगी धरती, रो रहा गगन,  हैं नम आँखें, टूटे से मन,

फिर भी आशा के पुष्पों से नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन।

अक्षुण्ण सबका सम्मान रहे,

निज मर्यादा का ध्यान रहे,

हों दानव-देव कहीं भी पर,

धरती पर बस इंसान रहे।

फिर कभी किसी भी बाला का हम सुनें न सिसकी या क्रंदन,

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन, नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन।

सत्ता के कान हुए बहरे,

निद्रा में लीन रहे पहरे,

मानव देखो दानव बन कर

दे गया ज़ख्म कितने गहरे!

आखिर कब तक यह सहन करें, संयम के टूट रहे बंधन,

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन, नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन।

आँगन में बिलख रहा बचपन,

सड़कों पर लुटता नव यौवन,

बर्बरता का प्रतिबिम्ब बने

वो रक्त सने निर्वस्त्र बदन.

तपते-झुलसे हर तन-मन पर तुम रख देना थोड़ा चन्दन,

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन, नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन।

-हेमन्त 'स्नेही'

Saturday, June 9, 2012

ठलुए खावें खीर

जिनकी आँखों में नहीं लाज-शरम का नीर,
वे ही बैठे लिख रहे भारत की तक़दीर.

हर दिन भ्रष्टाचार का बढ़ता जाता जाल,
क्या होगा इस देश का उठता बड़ा सवाल.

भाषण पर भाषण करैं नहीं जिन्हें कुछ ज्ञात,
कारटून पर कर रहे कारटून ही बात.

खुद को ज्ञानी मान कर पीटैं सबकी भद्द,
कारटून को कर दिया कारटून ने रद्द.

कलियुग की महिमा कहैं या फिर बस तकदीर,
मेहनतकश भूखे फिरैं ठलुए  खावें खीर.                                                    -हेमंत 'स्नेही'

Thursday, April 14, 2011

चलो, करें संकल्प (कुंडली)

अन्ना के अभियान को शत-शत करें प्रणाम,
रहे भ्रष्टाचार का कहीं देश में नाम,
कहीं देश में नाम हो रिश्वतखोरों का,
कारागारों में घर हो सारे चोरों का,
चलो, करें संकल्प आज सब मिल कर इतना,
सहें भ्रष्टाचार कष्ट हो चाहे जितना।

-
हेमन्त 'स्नेही'

Saturday, January 1, 2011

चलो, प्रदूषण से करें मिलजुल कर हम युद्ध

ये दोहे समर्पित हैं मंगलायतन विश्वविद्यालय के इन युवा छात्रों को,
जिन्होंने 'परिवर्तन' नामक एक मंच का गठन कर
पर्यावरण-रक्षा के लिए पहल की है।

औद्योगिक उन्नति बनी आज गले की फाँस,
जहरीली होती हवा मुश्किल लेना सांस।

जिधर देखिये बन रहे पिंजड़ेनुमा मकान,
ढूंढे से मिलते नहीं आँगन औ' दालान


गंगा भी दूषित हुई, हवा न मिलती शुद्ध,
चलो, प्रदूषण से करें मिलजुल कर हम युद्ध

दूध-दही की बात तो लगने लगी अजीब,
पीने का पानी कहाँ सबको भला नसीब


विज्ञानी हैरान हैं और खगोली दंग,
मौसम देखो बदल रहा कैसे-कैसे रंग


-हेमन्त 'स्नेही'

***


लोगे तुम जग जीत ( दोहे )


लक्ष्य अगर स्पष्ट हो, कुछ करने की चाह,
हर बाधा को चीर कर बन जाती है राह।

मन में दृढ़ संकल्प हो, अपने पर विश्वास,
मंजिल चल कर खुद-ब-खुद आ जाती है पास।

धन, वैभव या ज्ञान का करें न जो अभिमान,
उनको ही मिलता सदा स्नेह और सम्मान।

अधरों पर मृदुभाष हो, मन में निर्मल प्रीत,
बिना किसी हथियार के लोगे तुम जग जीत।

लगता रेगिस्तान सा यह दुनिया का चित्र,
मानसरोवर सा लगे मिले जो सच्चा मित्र.


-हेमन्त 'स्नेही'


Friday, December 25, 2009

बंजारे हैं जाना होगा ( ग़ज़ल )

बंजारे हैं जाना होगा,
जाने फिर कब आना होगा।

बस उतनी ही देर रुकेंगे,
जितना पानी-दाना होगा।

शहर बड़ा पर दिल छोटे हैं,
जाने कहाँ ठिकाना होगा।

चलो किया उसने जो चाहे,
हमको मगर निभाना होगा।

जिसने पथ में कांटे बोए,
वो जाना-पहचाना होगा।

कौन भला चुप रहने देगा,
कुछ तो रोना-गाना होगा।

रोने वाला पागल ठहरे,
हँसे तो वो दीवाना होगा।


दिल में दर्द भरा हो कितना,
होठों को मुस्काना होगा।

मौन रहो तो लोग कहेंगे,
कोई राज़ छिपाना होगा।

प्रियतम को देने की खातिर,
कुछ तो यहाँ कमाना होगा।

कुछ की तो मज़बूरी होगी,
कुछ का मगर बहाना होगा।

शमा जलेगी महफ़िल में पर,
कुरबां तो परवाना होगा।

आज जहाँ है धूम हमारी,
कल अपना अफसाना होगा।


-हेमन्त 'स्नेही'
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Saturday, November 7, 2009

आप यह भ्रम बनाए ही रखते (चार मुक्तक)

प्रेम-अनुबंध कहाँ पाओगे;
भाव-मकरंद कहाँ पाओगे,
धन से सुख तो खरीद लोगे पर,
मन का आनन्द कहाँ पाओगे।

भाव का मेह कहाँ पाओगे;
प्यार का गेह कहाँ पाओगे;
दोस्त चाहे तुम्हें मिलें लाखों,
किन्तु यह स्नेह कहाँ पाओगे।

प्रेम प्रासाद क्यों ढहा होता;
आँख से नीर क्यों बहा होता;
आप पर क्या न वार देते हम,
आपने बस कभी कहा होता।

एक दीपक जलाए ही रखते;
बात मन की छुपाए ही रखते;
था हमें भ्रम कि आप अपने हैं,
आप यह भ्रम बनाए ही रखते।

-हेमन्त 'स्नेही'
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